इजराइल बोला- हिजबुल्लाह से सीजफायर वार्ता नहीं करेंगे, नेतन्याहू ने अमेरिका से ईरान पर हमले की मांग की थी
इस्लामाबाद. इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान की बातचीत अभी साफ दिशा में जाती नहीं दिख रही है। अल जजीरा के मुताबिक दोनों पक्ष अलग-अलग उम्मीदों के साथ आए हैं और बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
सबसे बड़ी दिक्कत दोनों के बीच भरोसे की कमी है। हालात तब और पेचीदा हो गए जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अगर बातचीत सफल नहीं हुई तो मामला सैन्य कार्रवाई तक जा सकता है।
इस बातचीत में ईरान ने दो बड़ी शर्तें सामने रखी हैं। पहली, लेबनान में जारी लड़ाई को रोका जाए। दूसरी शर्त है ईरान के जमे हुए अरबों डॉलर के फंड को रिलीज करना, जो 1979 से अलग-अलग देशों में फंसा हुआ है।
हालांकि अमेरिका क्लियर कर चुका है कि वो ईरान के फंड को रीलीज नहीं करेगा।
ईरान बोला- अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जर्मनी के समकक्ष योहान वाडेफुल से फोन पर कहा कि ईरान को अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक उन्होंने कहा कि ईरानी डेलिगेशन को होने वाली बातचीत पर भी यकीन नहीं है। अराघची ने कहा कि अमेरिका ने बार-बार अपने वादे तोड़े हैं और कूटनीति के साथ विश्वासघात किया है। यही वजह है कि ईरान उस पर भरोसा नहीं करता। उन्होंने कहा कि सरकार ईरानी जनता के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी ताकत से लड़ेगी।
इजराइल बोला- हिजबुल्लाह से सीजफायर वार्ता नहीं करेंगे
इजराइन ने कहा है कि वो लेबनान के उग्रवादी संगठन हिजबुल्लाह के साथ युद्धविराम पर बातचीत नहीं करेगा। इससे पहले खबर आई थी कि अमेरिका में इजराइल और लेबनान के प्रतिनिधियों के बीच बैठक होगी।
दावा- नेतन्याहू ने कई बार अमेरिका से ईरान पर हमले की मांग की थी
अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा कि इजराइली पीएम नेतन्याहू कई बार अमेरिका से ईरान पर हमला करने की मांग कर चुके हैं। हालांकि बराक ओबामा, जो बाइडेन और जॉर्ज बुश इस मांग का ठुकरा चुके थे।
केरी के अनुसार, सिर्फ डोनाल्ड ट्रम्प ही ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने इस तरह की कार्रवाई के लिए सहमति दिखाई।
ईरान बोला- अमेरिका फर्स्ट अच्छा, इजराइल फर्स्ट ठीक नहीं
ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने कहा है कि इस्लामाबाद में चल रही बातचीत का नतीजा अमेरिका की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
उन्होंने X पर लिखा कि अगर अमेरिकी प्रतिनिधि ‘अमेरिका फर्स्ट’ हितों पर ध्यान देते हैं, तो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद समझौता संभव है। लेकिन अगर अमेरिका ‘इजराइल फर्स्ट’ एजेंडे की ओर जाता है, तो कोई समझौता नहीं हो पाएगा।
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में ईरान पहले से ज्यादा मजबूती से अपनी रक्षा जारी रखेगा। फिर इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा और इसकी कीमत ज्यादा चुकानी पड़ेगी।