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9 अप्रैल 2026
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असम विधानसभा चुनाव कल, क्या हिमंत बिस्वा लगा पाएंगे अपनी नैय्या पार, परिसीमन ने बदल दिये समीकरण

असम विधानसभा चुनाव कल, क्या हिमंत बिस्वा लगा पाएंगे अपनी नैय्या पार, परिसीमन ने बदल दिये समीकरण
असम विधानसभा चुनाव कल, क्या हिमंत बिस्वा लगा पाएंगे अपनी नैय्या पार, परिसीमन ने बदल दिये समीकरण

नई दिल्ली। असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए गुरुवार, 9 अप्रैल को मतदान होगा। इस चुनाव का परिणाम 4 मई को सामने आएगा। लेकिन इस बार का असम विधानसभा चुनाव पहले बार की तरह नहीं होगा, क्योंकि परिसीमन ने असम में चुनावी क्षेत्रों की आबादी का नक्शा बदल दिया है।

बटाद्रबा, सुअलकुची शहर और बारपेटा जैसे चुनावी क्षेत्र इस बात का प्रमाण है कि परिसीमन के बाद इन चुनावी क्षेत्रों का विशेष महत्व है। 2023 में परिसीमन हुआ, जिसके बाद कुछ चुनावी क्षेत्र एक साथ आ गए, जिससे राजनीति का समीकरण भी बदल गया है।

2023 के परिसीमन से बदली बटाद्रबा की स्थिति

नगांव जिले में स्थित बटाद्रबा के चुनावी क्षेत्र का विशेष महत्व है, क्योंकि यह 15वीं सदी के नव-वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव का जन्मस्थान है। जब 1978 में इस क्षेत्र का गठन हुआ था, तब बटाद्रबा सीट पर लगभग 30% वोटर मुस्लिम थे। 2021 आते-आते, इस चुनावी क्षेत्र में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा हो गई।

2016 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने यहां एक चौंकाने वाली जीत हासिल की थी, जिसका श्रेय मुस्लिम वोटों के बंटवारे को जाता है। यह एकमात्र ऐसा मौका था जब कांग्रेस या AGP के अलावा किसी अन्य पार्टी ने बटाद्रबा से विधायक का चुनाव जीता था। इससे पहले शुरुआत में केवल 'रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया' जीत हासिल कर चुकी है।

2023 से पहले 1976 में पहला परिसीमन हुआ था और वो 1971 की जनगणना पर आधारित था, उसने बटाद्रबा के चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया था, जिससे यह सभी पार्टियों के लिए एक बेहद दिलचस्प मुकाबला बन गया।

बटाद्रबा को नगांव चुनावी क्षेत्र के कुछ हिस्सों के साथ मिलाकर 'नगांव-बटाद्रबा' नाम का एक नया क्षेत्र बनाया गया। पहले की बटाद्रबा और नगांव सीटों में जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या बहुत ज्यादा थी, उन इलाकों को पास के मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों—जैसे कि ढिंग, समगुरी और रूपाहीहाट के साथ मिला दिया गया।

सीमाओं का यह पुनर्निर्धारण इस तरह से किया गया कि मुस्लिम-बहुल इलाकों को उन चुनावी क्षेत्रों में भेज दिया गया, जहां पहले से ही मुस्लिमों का स्पष्ट बहुमत मौजूद था। नगांव-बटाद्रबा में, 2023 के परिसीमन के बाद मुस्लिम वोटरों की हिस्सेदारी घटकर 40% पर आ गई।

इसका नतीजा यह हुआ कि नगांव जिले में, जहां 2011 की जनगणना के अनुसार 55% आबादी मुस्लिमों की थी, ऐसे चुनावी क्षेत्रों की संख्या, जहां इस समुदाय का निर्णायक प्रभाव था, पांच से घटकर केवल तीन रह गई।

बारपेटा का भी हुआ पुनर्गठन

निचले असम के बारपेटा में भी कुछ ऐसी ही कहानी है। यह असमिया वैष्णव संस्कृति का एक और आध्यात्मिक केंद्र है और यहां बारपेटा सत्र (मठ) स्थित है, जिसकी स्थापना श्रीमंत शंकरदेव के प्रमुख शिष्य महापुरुष माधवदेव ने की थी।

2023 के परिसीमन से पहले, इस शहरी निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 57% मतदाता मुस्लिम थे। यहां मुस्लिम-बहुल इलाकों को बारपेटा से अलग करके मांडिया और चेंगा में मिला दिया गया, जहां यह समुदाय पहले से ही चुनावी रूप से हावी है और जो नया बारपेटा निर्वाचन क्षेत्र अस्तित्व में आया है, उसमें केवल 20% मुस्लिम मतदाता हैं।

पिछले 10 विधानसभा चुनावों में, बारपेटा का प्रतिनिधित्व सात बार मुस्लिम विधायकों ने किया है। इसमें 2021 का चुनाव भी शामिल है, जब कांग्रेस के अब्दुर रहीम अहमद ने जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार, AGP (NDA का एक घटक दल) और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने हिंदू उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।

परिसीमन के बाद बीजेपी-कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप

बटाद्रबा थान के 'डेका सत्रिया' (धार्मिक पदाधिकारी) रंजीत महंत (65) का कहना है कि परिसीमन के साथ-साथ, मंदिर परिसर से जुड़ी 160 बीघा जमीन से अतिक्रमणकारियों को हटाना भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

2016 में राज्य में पहली बार सत्ता में आने के तुरंत बाद, सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली BJP सरकार ने 300 से अधिक परिवारों को बेदखल कर दिया था। ये सभी परिवार बांग्लादेशी मूल के मुस्लिम थे। हाल ही में, राज्य सरकार ने बटाद्रबा थान के पुनर्विकास के लिए 200 करोड़ रुपये भी आवंटित किए हैं।

कांग्रेस के उम्मीदवार दुर्लभ चामुआ का कहना है कि नगांव-बटाद्रबा निर्वाचन क्षेत्र का गठन केवल BJP के लिए हिंदू वोट पक्के करने के मकसद से किया गया था और श्रीमंत शंकरदेव की विरासत को बढ़ावा देने का विचार तो बाद में आया।

बारपेटा से NDA के उम्मीदवार दीपक कुमार दास का कहना है कि परिसीमन से वैष्णव संस्कृति से जुड़ी सीटों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। दीपक कुमार दास का कहना है, 'ये व्यापक असमिया समुदाय की पहचान हैं। इसलिए, परिसीमन जरूरी था।'

परिसीमन के बाद सीटों की संख्या घटी

सुअलकुची शहर, जिसे अक्सर अपनी रेशम बुनाई के लिए 'पूरब का मैनचेस्टर' कहा जाता है। पहले ये मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा था।

इसी तरह, गुवाहाटी के पड़ोसी कामरूप जिले के दो अन्य निर्वाचन क्षेत्र बोको और चायगांव, जहां मुसलमानों का दबदबा था, उन्हें 2023 के परिसीमन के बाद मिलाकर एक ही सीट (बोको-चायगांव) बना दिया गया है।

इस सीट को अब अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है, जिससे पहली बार चुनावी लाभ स्थानीय राभा, गारो और बोडो आबादी की ओर झुक गया है।

इन निर्वाचन क्षेत्रों के मुस्लिम-बहुल इलाकों को एक साथ मिलाकर 'चमारिया' नामक एक नया निर्वाचन क्षेत्र बनाया गया है। इसके परिणामस्वरूप, कामरूप जिले में ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या, जहां मुसलमानों को चुनावी बढ़त हासिल थी, दो से घटकर एक रह गई है।

राभा हासोंग और गारो जैसे कई आदिवासी समूहों का घर, 'गोलपारा (पश्चिम)' निर्वाचन क्षेत्र अब अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इस निर्वाचन क्षेत्र से अब तक कभी भी कोई हिंदू विधायक चुनकर नहीं आया है।

ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित लखीमपुर जिले के 'नाओबोइचा' निर्वाचन क्षेत्र को भी इसी तरह अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आरक्षित कर दिया गया है।

इस सीट पर पहली जीत 1967 में भूपेन हजारिका ने एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में हासिल की थी। इसके बाद से यहां मुसलमानों का दबदबा रहा, जहां कांग्रेस और AGP के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।