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9 अप्रैल 2026
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ईरान के साथ खड़े हो गए रूस-चीन! क्या अमेरिका और इजरायल ‘बिना यूएन की मंजूरी के’ अकेले ही सैन्य कदम उठाएंगे?

ईरान के साथ खड़े हो गए रूस-चीन! क्या अमेरिका और इजरायल ‘बिना यूएन की मंजूरी के’ अकेले ही सैन्य कदम उठाएंगे?
ईरान के साथ खड़े हो गए रूस-चीन! क्या अमेरिका और इजरायल ‘बिना यूएन की मंजूरी के’ अकेले ही सैन्य कदम उठाएंगे?

ईरान को घेरने और स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवाने के ल‍िए अमेर‍िका के दोस्‍तों ने एक बड़ी चाल चली थी. लेकिन रूस और चीन ईरान के साथ आकर खड़े गए. होर्मुज के रास्ते को सुरक्षित करने के नाम पर बहरीन यूएन स‍िक्‍योर‍िटी काउंस‍िल में गल्‍फ ड्राफ्ट रिजॉल्‍यूशन लेकर आया था. लेकिन रूस और चीन ने ‘वीटो’ पावर का इस्तेमाल कर उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया है.संयुक्त राष्ट्र में चले हफ्तों के ड्रामे के बाद वोटिंग हुई. सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 11 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला. दो देश पाकिस्तान और कोलंबिया वोटिंग से दूर रहे यानी गैर-हाजिर रहे. अमेरिका को उम्मीद थी कि भारी बहुमत देखकर रूस-चीन हिचकेंगे, लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा. रूस और चीन ने अपने विशेष अधिकार वीटो का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को गिरा दिया.

प्रस्‍ताव ग‍िरने से खाड़ी देश भड़क उठे
बहरीन का प्रस्‍ताव ग‍िरने के बाद खाड़ी देशों ने नाराजगी जताई. बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल जयानी ने यूएन स‍िक्‍योर‍िटी काउंस‍िल में बहरीन, यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और जॉर्डन का बयान पढ़ा. इसमें प्रस्‍ताव ग‍िरने पर न‍िराशा जताई गई है. अल जयानी ने कहा, हमने इस बात पर खेद जताया है कि आज आपके सामने पेश किया गया प्रस्ताव पारित नहीं हो सका. परिषद एक अवैध गतिविधि के मामले में अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही. होर्मुज खोलने के लिए बिना किसी देरी के बड़ी कार्रवाई जरूरी थी.

‘चैप्टर 7’ का डर और प्रस्ताव का बदला हुआ रंग

इस प्रस्ताव के पीछे असली डर ‘चैप्टर VII’ का था. संयुक्त राष्ट्र के कानून में चैप्टर 7 का मतलब होता है- ‘सैन्य बल का इस्तेमाल करने की अनुमति’. शुरुआत में अमेरिका के दोस्त चाहते थे कि इसमें सीधे हमला करने की छूट मिले. जब रूस-चीन ने आंखें दिखाईं, तो इसे नरम किया गया और लिखा गया कि राज्यों को सभी आवश्यक रक्षात्मक साधनों का उपयोग करने की अनुमति दी जाए.

अंत में इसे और हल्का कर सिर्फ रक्षात्मक प्रयासों को प्रोत्साहित करने तक सीमित कर दिया गया. लेकिन रूस-चीन को पता था कि अगर एक बार अंगुली पकड़ा दी, तो अमेरिका पूरा हाथ पकड़ लेगा और ईरान पर हमला कर देगा. इसलिए उन्होंने सिरे से इसे खारिज कर दिया.

बहरीन की तीखी चेतावनी

इस बैठक की अध्यक्षता बहरीन के विदेश मंत्री डॉ. अब्दुललतीफ बिन राशिद अल ज़यानी कर रहे थे. वोटिंग से पहले उन्होंने सुरक्षा परिषद को डराने की पूरी कोशिश की. उन्होंने कहा कि ईरान ने होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण जलमार्ग को हथियार बना लिया है. अगर आज हमने उसे नहीं रोका, तो कल दुनिया के बाकी समुद्री रास्तों पर भी यही होगा और पूरी दुनिया एक ‘जंगल’ में बदल जाएगी.

बहरीन और अन्य खाड़ी देशों का तर्क था कि ईरान का व्यवहार शत्रुतापूर्ण है और इसे रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप जरूरी है. लेकिन रूस-चीन ने साफ कर दिया कि वे किसी भी ऐसे प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेंगे जो ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का आधार बने.

नतीजा क्‍या होगा

रूस-चीन के वीटो के बाद अब अमेरिका और उसके साथियों के पास ईरान को कानूनी रूप से रोकने का रास्ता बंद हो गया है. ट्रंप की डेडलाइन सिर पर है और यूएन से कोई मदद नहीं मिली. अब खतरा इस बात का है कि क्या अमेरिका और इजरायल ‘बिना यूएन की मंजूरी के’ अकेले ही कोई सैन्य कदम उठाएंगे? अगर ऐसा हुआ, तो खाड़ी के पानी में बारूद की गंध और तेज हो जाएगी.