दैनिक सम्राट संवाददाता
जमवारामगढ़ (अंकिता शर्मा)। समाज में बेटियों की भूमिका को लेकर बदलती सोच का एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब नारदपुरा जेडीए कॉलोनी निवासी हंसराज अग्रवाल की अंतिम यात्रा में उनकी दोनों बेटियों ने कंधा देकर और मुखाग्नि देकर अपने पिता को अंतिम विदाई दी।यह हृदय विदारक दृश्य देखकर वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। दुख की इस घड़ी में बेटियों ने जिस साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह न केवल भावुक करने वाला था, बल्कि समाज के लिए एक सशक्त संदेश भी छोड़ गया—कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं।
हंसराज अग्रवाल के जीवन में दुखों का लंबा सिलसिला रहा। लगभग 25 वर्ष पूर्व एक दर्दनाक दुर्घटना में उनका पूरा परिवार—पत्नी और तीन बच्चों सहित 14 लोग—काल के गाल में समा गए थे। इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी की, लेकिन करीब 7-8 वर्ष पहले बीमारी के चलते उनकी दूसरी पत्नी का भी निधन हो गया।जीवन की इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच उनकी दो बेटियां ही उनका सहारा बनी रहीं। अंतत: जब पिता का साया भी सिर से उठ गया, तो इन बेटियों ने समाज की परंपराओं को पीछे छोड़ते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन किया और पूरे सम्मान के साथ पिता का अंतिम संस्कार किया। यह घटना न केवल बेटियों के साहस, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रतीक है, बल्कि यह समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अब समय आ गया है जब बेटा-बेटी के बीच भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो। ऐसी बहादुर और संस्कारी बेटियों पर हर किसी को गर्व है।
