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16 अप्रैल 2026
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सबरीमाला मंदिर की सुप्रीम कोर्ट में चौथे दिन सुनवाई, मंदिर बोर्ड ने कहा- मंदिर कोई खिलोने की दुकान नहीं

सबरीमाला मंदिर की सुप्रीम कोर्ट में चौथे दिन सुनवाई, मंदिर बोर्ड ने कहा- मंदिर कोई खिलोने की दुकान नहीं
सबरीमाला मंदिर की सुप्रीम कोर्ट में चौथे दिन सुनवाई, मंदिर बोर्ड ने कहा- मंदिर कोई खिलोने की दुकान नहीं

दैनिक सम्राट संवाददाता
नई दिल्ली।
केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में चौथे दिन सुनवाई हुई। मंदिर का मैनेजमेंट देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने कहा कि यह खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यह आजन्म ब्रह्मचारी माने जाने वाले देवता का मंदिर है।
टीडीबी का पक्ष रखते हुए एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा- 10 से 50 साल के उम्र की महिलाएं देवता के स्वरूप और पहचान के विपरीत हैं। भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता।
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया। इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं। सुप्रीम कोर्ट में इनके आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर बहस हो रही है।
जनहित याचिका पर सवाल: एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि धार्मिक मामलों में जनहित याचिका से बचना चाहिए। इससे बाहरी लोग परंपराओं में दखल देने लगते हैं। कोर्ट ने भी पूछा कि क्या कोई भी व्यक्ति आस्था से जुड़े नियमों को चुनौती दे सकता है।
धर्म बनाम सामाजिक सुधार पर बहस: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। जजों ने साफ किया कि सुधार और धार्मिक मान्यता के बीच संतुलन जरूरी है।
आर्टिकल 25 बनाम आर्टिकल 26 का विवाद: सिंघवी ने दलील दी कि धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम तय करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में संस्थाओं का अधिकार व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर हो सकता है।
धार्मिक प्रथा की सीमा तय करने पर टकराव: सिंघवी ने कहा कि कौन-सी प्रथा धार्मिक है, यह तय करने का अधिकार समुदाय का होना चाहिए, न कि कोर्ट का। इस पर जजों ने भी अपनी भूमिका की सीमा पर चर्चा की।
महिलाओं की एंट्री: इसके विरोध वाले पक्ष ने कहा कि महिलाओं की एंट्री पर रोक परंपरा और भगवान अय्यप्पा की मान्यता से जुड़ी है। वहीं समर्थन करने वाले पक्ष ने इसे महिलाओं के बराबरी के अधिकार का मामला बताया। कोर्ट में कल इस पर चर्चा जारी रहेगी।