नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंगलवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन 5 घंटे सुनवाई की। केंद्र ने शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक का समर्थन किया।
सरकार ने कहा, ‘2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को एंट्री देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत था। यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अपने अधिकार से जुड़ा है। अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं।
सरकार ने कहा कि अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा- इस मामले में ‘अनुच्छेद 17’ यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को 'अछूत' माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई 'अछूतपन' न रह जाए।
केंद्र ने कहा- हर धार्मिक प्रथा का सम्मान करना चाहिए, 5 पॉइंट्स
- सरकार ने कहा, 'हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए और हर चीज को गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना जरूरी है, तो इसे अधिकारों का हनन नहीं कहा जा सकता।
- जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। इस पर केंद्र ने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(b) में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
- केंद्र ने कहा कि अगर कोई प्रथा सीधे तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ है (जैसे मानव बलि), तो अदालत उसे तुरंत खारिज कर सकती है।
- केंद्र का तर्क था कि अदालत को यह तय करने से बचना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत, आधुनिक या वैज्ञानिक है या नहीं, क्योंकि इससे न्यायपालिका अपने विचार धर्म पर थोपने लगेगी।
- केंद्र ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता इसलिए देता है क्योंकि धर्म में कई ऐसी मान्यताएं और प्रथाएं होती हैं जो सामान्य तर्क या बहुमत की सोच से मेल नहीं खातीं।